Exam Details
UPPCS GS PAPER 2 2014
Review the key details, then start the test when you are ready. You can also open the full package to see related papers.
Questions
100
Duration
180 mins
Package
UP State Exams - Previous Year Papers
Paper pattern & analysis
Filter this paper by subject, topic or subtopic. Every graph updates from the selected questions.
Topic distribution
Subtopic distribution
Difficulty distribution
100questions
Medium
62
62%
Easy
21
21%
Hard
17
17%
Question type distribution
100questions
Multiple Choices
100
100%
Instructions
Demo Instruction
Syllabus
Sample
Sample questions from this paper
Questions are selected across the paper subjects wherever the paper contains that variety.
2014 · Unclassified
UPPCS GS PAPER 2 2014
निर्देष: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए- मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं, एक समस्या शरीर की है, जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएं मानी जा सकती हैं, किन्तु सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दुःख, दौर्मनस्य, रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है, इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र, न मोटर और महल हो सकते हैं, प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था, इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ नहीं जा सकता, डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता, वह या तो सत्य ही नहीं है, अथवा है तो ऐसा है, जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया, त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे, जहाँ तक सम्भव हों विज्ञान की भाषा में रखें, किन्तु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाष्वत समस्याएं दूर नहीं हुई। वह आज भी दुःखी है, वह आज भी रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल, विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में, शायद ही कोई रहा हो - अतएव, चिन्तकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है, क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाए, आन्तरिक सन्तोष में वृद्धि नहीं होती, उलटे, दिनोंदिन उसकी मात्रा घटती जाती है,
विज्ञान का सत्य किस पर आधारित है?
विज्ञान का सत्य किस पर आधारित है?
2014 · Unclassified
UPPCS GS PAPER 2 2014
निर्देष: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए- मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं, एक समस्या शरीर की है, जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएं मानी जा सकती हैं, किन्तु सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दुःख, दौर्मनस्य, रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है, इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र, न मोटर और महल हो सकते हैं, प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था, इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ नहीं जा सकता, डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता, वह या तो सत्य ही नहीं है, अथवा है तो ऐसा है, जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया, त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे, जहाँ तक सम्भव हों विज्ञान की भाषा में रखें, किन्तु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाष्वत समस्याएं दूर नहीं हुई। वह आज भी दुःखी है, वह आज भी रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल, विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में, शायद ही कोई रहा हो - अतएव, चिन्तकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है, क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाए, आन्तरिक सन्तोष में वृद्धि नहीं होती, उलटे, दिनोंदिन उसकी मात्रा घटती जाती है,
विज्ञान की सीमा क्या है?
विज्ञान की सीमा क्या है?
2014 · Unclassified
UPPCS GS PAPER 2 2014
निर्देष: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए- मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं, एक समस्या शरीर की है, जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएं मानी जा सकती हैं, किन्तु सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दुःख, दौर्मनस्य, रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है, इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र, न मोटर और महल हो सकते हैं, प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था, इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ नहीं जा सकता, डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता, वह या तो सत्य ही नहीं है, अथवा है तो ऐसा है, जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया, त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे, जहाँ तक सम्भव हों विज्ञान की भाषा में रखें, किन्तु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाष्वत समस्याएं दूर नहीं हुई। वह आज भी दुःखी है, वह आज भी रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल, विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में, शायद ही कोई रहा हो - अतएव, चिन्तकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है, क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाए, आन्तरिक सन्तोष में वृद्धि नहीं होती, उलटे, दिनोंदिन उसकी मात्रा घटती जाती है,
उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार-
उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार-
2014 · Unclassified
UPPCS GS PAPER 2 2014
निर्देष: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए- मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं, एक समस्या शरीर की है, जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएं मानी जा सकती हैं, किन्तु सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दुःख, दौर्मनस्य, रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है, इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र, न मोटर और महल हो सकते हैं, प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था, इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ नहीं जा सकता, डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता, वह या तो सत्य ही नहीं है, अथवा है तो ऐसा है, जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया, त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे, जहाँ तक सम्भव हों विज्ञान की भाषा में रखें, किन्तु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाष्वत समस्याएं दूर नहीं हुई। वह आज भी दुःखी है, वह आज भी रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल, विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में, शायद ही कोई रहा हो - अतएव, चिन्तकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है, क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाए, आन्तरिक सन्तोष में वृद्धि नहीं होती, उलटे, दिनोंदिन उसकी मात्रा घटती जाती है,
प्राचीन और मध्यकालीन विश्व की जीवन के विषय में चिन्तन दृष्टि क्या थी?
प्राचीन और मध्यकालीन विश्व की जीवन के विषय में चिन्तन दृष्टि क्या थी?
2014 · Unclassified
UPPCS GS PAPER 2 2014
निर्देष: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए- मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं, एक समस्या शरीर की है, जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएं मानी जा सकती हैं, किन्तु सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दुःख, दौर्मनस्य, रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है, इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र, न मोटर और महल हो सकते हैं, प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था, इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ नहीं जा सकता, डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता, वह या तो सत्य ही नहीं है, अथवा है तो ऐसा है, जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया, त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे, जहाँ तक सम्भव हों विज्ञान की भाषा में रखें, किन्तु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाष्वत समस्याएं दूर नहीं हुई। वह आज भी दुःखी है, वह आज भी रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल, विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में, शायद ही कोई रहा हो - अतएव, चिन्तकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है, क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाए, आन्तरिक सन्तोष में वृद्धि नहीं होती, उलटे, दिनोंदिन उसकी मात्रा घटती जाती है,
निम्नलिखित में से कौन तत्पुरूष समास का उदाहरण नहीं है?
निम्नलिखित में से कौन तत्पुरूष समास का उदाहरण नहीं है?
2014 · Unclassified
UPPCS GS PAPER 2 2014
निर्देष: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा दिए गए प्रश्नों के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए- मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं, एक समस्या शरीर की है, जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएं मानी जा सकती हैं, किन्तु सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दुःख, दौर्मनस्य, रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है, इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र, न मोटर और महल हो सकते हैं, प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था, इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ नहीं जा सकता, डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता, वह या तो सत्य ही नहीं है, अथवा है तो ऐसा है, जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया, त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गए, यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे, जहाँ तक सम्भव हों विज्ञान की भाषा में रखें, किन्तु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाष्वत समस्याएं दूर नहीं हुई। वह आज भी दुःखी है, वह आज भी रोग, शोक, जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल, विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में, शायद ही कोई रहा हो - अतएव, चिन्तकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है, क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाए, आन्तरिक सन्तोष में वृद्धि नहीं होती, उलटे, दिनोंदिन उसकी मात्रा घटती जाती है,
‘सिर से पानी गुजर जाना’ मुहावरे का उपयुक्त अर्थ क्या है?
‘सिर से पानी गुजर जाना’ मुहावरे का उपयुक्त अर्थ क्या है?