My Cart
Your Cart 0

    Your cart is empty.

  • Total (Amount) ₹0.00
Exam Details

UGC NET JUNE (HINDI) 2019

Review the key details, then start the test when you are ready. You can also open the full package to see related papers.

Questions 100
Duration 180 mins
Package UGC NET & SET - Previous Year Papers

Paper pattern & analysis

Filter this paper by subject, topic or subtopic. Every graph updates from the selected questions.

Explore previous papers
Showing all 100 questions in this paper.

Subject distribution

No subject classification is available.

Topic distribution

No topic classification is available.

Subtopic distribution

No subtopic classification is available.

Difficulty distribution

Medium 74 74%
Hard 25 25%
Easy 1 1%

Question type distribution

Multiple Choices 100 100%

Instructions

Demo Instruction

Syllabus

Sample

Sample questions from this paper

Questions are selected across the paper subjects wherever the paper contains that variety.

1
2019 · Unclassified
UGC NET JUNE (HINDI) 2019
निर्देश: भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वास्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का सम्बन्ध उस अर्थ से है जिसमे कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है।
राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरुप जैसा प्रतिभासित होता है उनका वर्णन वे उसी रूप में करते है। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्यूंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है। जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुन्दर के साथ असुंदर का चित्रण सुन्दर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य में साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएव असुंदर या अशिव का चित्रण सुन्दर और शिव के सम्प्रेषण में लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्यूंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुन्दर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौन्दर्यबोध के नए व्यापक धरातल में सुन्दर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में अर्थभिनत्ता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक सन्दर्भ में भी इस काव्यदृष्टि की प्रांसगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है की इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के सन्दर्भ में काव्य-मनीषियों की दृष्टि से समन्वयात्मक होने का आधार क्या है?
A
उसका मनोवैज्ञानिक यथार्थ से ज़ुडा होना
B
मनोवैज्ञानिक यथार्थ और आदर्शवाद से जुड़ा होना
C
प्रगतिवाद के सैद्धांतिक आधार को अपनाना
D
आदर्शवादी दार्शनिकता से जुड़ा होना
2
2019 · Unclassified
UGC NET JUNE (HINDI) 2019
निर्देश: भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वास्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का सम्बन्ध उस अर्थ से है जिसमे कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है।
राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरुप जैसा प्रतिभासित होता है उनका वर्णन वे उसी रूप में करते है। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्यूंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है। जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुन्दर के साथ असुंदर का चित्रण सुन्दर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य में साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएव असुंदर या अशिव का चित्रण सुन्दर और शिव के सम्प्रेषण में लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्यूंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुन्दर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौन्दर्यबोध के नए व्यापक धरातल में सुन्दर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में अर्थभिनत्ता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक सन्दर्भ में भी इस काव्यदृष्टि की प्रांसगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है की इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
A
काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानव-लोक में होती है
B
काव्य के अर्थ का आधार कल्पना और सौंदर्य है
C
काव्य के कर्ता वस्तुओं का वर्णन उसी रूप में नहीं करते जैसा उन्हें प्रतिभासित होता है
D
भारतीय काव्य-मनीषा ने अर्थ की सीमा का भी अन्वेषण किया है
3
2019 · Unclassified
UGC NET JUNE (HINDI) 2019
निर्देश: भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वास्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का सम्बन्ध उस अर्थ से है जिसमे कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है।
राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरुप जैसा प्रतिभासित होता है उनका वर्णन वे उसी रूप में करते है। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्यूंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है। जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुन्दर के साथ असुंदर का चित्रण सुन्दर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य में साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएव असुंदर या अशिव का चित्रण सुन्दर और शिव के सम्प्रेषण में लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्यूंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुन्दर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौन्दर्यबोध के नए व्यापक धरातल में सुन्दर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में अर्थभिनत्ता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक सन्दर्भ में भी इस काव्यदृष्टि की प्रांसगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है की इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार काव्य-मनीषियों की प्रगतिशील दृष्टि का आधार क्या है?
A
काव्य को तथ्यात्मक रूप में चित्रित करना
B
समन्वयात्मक दृष्टि को अपनाना
C
कल्पना को काव्य का आधार बनाना
D
काव्य में अशिव और असुंदर को प्रमुखता देना
4
2019 · Unclassified
UGC NET JUNE (HINDI) 2019
निर्देश: भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वास्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का सम्बन्ध उस अर्थ से है जिसमे कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है।
राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरुप जैसा प्रतिभासित होता है उनका वर्णन वे उसी रूप में करते है। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्यूंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है। जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुन्दर के साथ असुंदर का चित्रण सुन्दर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य में साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएव असुंदर या अशिव का चित्रण सुन्दर और शिव के सम्प्रेषण में लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्यूंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुन्दर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौन्दर्यबोध के नए व्यापक धरातल में सुन्दर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में अर्थभिनत्ता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक सन्दर्भ में भी इस काव्यदृष्टि की प्रांसगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है की इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
A
काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर का समावेश रहता है
B
काव्य का मूल प्रयोजन सत्य के रूप में ही अभिव्यक्त होता है
C
कवि क्यूंकि लोक की यात्रा करता है, इसलिए सुन्दर के साथ असुंदर का चित्रण संभव नहीं
D
अशिव का चित्रण शिव के चित्रण के लिए अनिवार्य है
5
2019 · Unclassified
UGC NET JUNE (HINDI) 2019
निर्देश: भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वास्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का सम्बन्ध उस अर्थ से है जिसमे कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है।
राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरुप जैसा प्रतिभासित होता है उनका वर्णन वे उसी रूप में करते है। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्यूंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है। जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुन्दर के साथ असुंदर का चित्रण सुन्दर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुन्दर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य में साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएव असुंदर या अशिव का चित्रण सुन्दर और शिव के सम्प्रेषण में लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्यूंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुन्दर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौन्दर्यबोध के नए व्यापक धरातल में सुन्दर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में अर्थभिनत्ता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक सन्दर्भ में भी इस काव्यदृष्टि की प्रांसगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है की इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
A
काव्य का सत्य अनिवार्य रूप से मानव-कल्याण का साधन नहीं है
B
काव्य का सत्य तथ्यात्मक होता है
C
काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से अभिन्न होता है
D
काव्य का सत्य अनुभूतिपरक है
6
2019 · Unclassified
UGC NET JUNE (HINDI) 2019
निर्देश: प्रश्न में दो कथन दिए गए हैं। इनमे से एक स्थापना (Assertion) A है
और दूसरा तर्क (Reason) (R) है। दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए:
स्थापना (Assertion) A: यूरोपीय साहित्य मीमांसा में कल्पना को बहुत प्रधानता दी गई है।
तर्क (Reason) (R): कल्पना काव्य का अनिवार्य साध्य है।
विकल्प:
A
(A) सही (R) सही
B
(A) गलत (R) सही
C
(A) सही (R) गलत
D
(A) गलत (R) गलत